बुलडोजर से जमींदोज हुआ ऐतिहासिक शहीद द्वार,63 वर्षों पुरानी धरोहर बनी मलबे का ढेर
रेत से भरे डंपर की टक्कर के बाद हुआ ध्वस्तीकरण,नागरिकों ने उठाए पुनर्निर्माण और जिम्मेदारी तय करने के सवाल
ग्लोबल इंडिया टूडे न्यूज M.P.
कटनी। नई बस्ती क्षेत्र की पहचान और शहीदों की स्मृति का प्रतीक रहा ऐतिहासिक शहीद द्वार गुरुवार दोपहर नगर निगम की कार्रवाई में बुलडोजर से जमींदोज कर दिया गया। बुधवार रात रेत से भरे एक डंपर की टक्कर से क्षतिग्रस्त हुए इस प्रवेश द्वार को प्रशासन ने राहगीरों की सुरक्षा को देखते हुए गिराने का निर्णय लिया। बुलडोजर की कार्रवाई के साथ ही 63 वर्षों से शहर की शान और गौरव का प्रतीक रहा यह ऐतिहासिक द्वार मलबे के ढेर में तब्दील हो गया।
जानकारी के अनुसार बुधवार देर रात तेज रफ्तार से गुजर रहे रेत से भरे एक डंपर ने नई बस्ती स्थित शहीद द्वार को जोरदार टक्कर मार दी थी। टक्कर इतनी भीषण थी कि द्वार का एक हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और पूरी संरचना असंतुलित होकर कभी भी गिरने की स्थिति में पहुंच गई। घटना के बाद स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन और नगर निगम को इसकी जानकारी दी तथा संभावित हादसे की आशंका जताई।
नगर निगम के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण किए जाने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि क्षतिग्रस्त संरचना राहगीरों और आसपास के लोगों के लिए खतरा बन सकती है। इसके बाद दोपहर में बुलडोजर और निगम अमले की मौजूदगी में द्वार को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया। कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी मौजूद रहे,जिनमें कई लोगों ने इस ऐतिहासिक धरोहर के समाप्त होने पर दुख व्यक्त किया।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि प्रशासन समय रहते इस स्मारक की देखरेख और मरम्मत करता तो शायद इसे बचाया जा सकता था। लोगों का आरोप है कि वर्षों से इस ऐतिहासिक द्वार के संरक्षण और रखरखाव की ओर कोई गंभीर ध्यान नहीं दिया गया। दुर्घटना के बाद भी इसकी मरम्मत या संरक्षण के विकल्पों पर विचार करने के बजाय सीधे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कर दी गई।
शहीदों की स्मृति से जुड़ा है गौरवशाली इतिहास
शहीद द्वार केवल एक प्रवेश द्वार नहीं था,बल्कि देशभक्ति और बलिदान की भावना का प्रतीक भी था। इतिहासकारों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए वीर सैनिकों की स्मृति में नई बस्ती के प्रतिष्ठित नागरिकों एवं समाजसेवियों ने जनसहयोग से वर्ष 1963 में इस द्वार का निर्माण कराया था। तब से लेकर आज तक यह द्वार नई बस्ती क्षेत्र की पहचान बना हुआ था और शहर में प्रवेश करने वाले लोगों का स्वागत करता था।
करीब 63 वर्षों तक खड़े रहे इस स्मारक ने शहर के विकास,सामाजिक बदलाव और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी बनकर अपनी अलग पहचान बनाई। यही कारण है कि इसके ध्वस्त होने से क्षेत्रवासियों में भावनात्मक जुड़ाव और निराशा दोनों दिखाई दे रहे हैं।
पुनर्निर्माण की मांग हुई तेज
शहर के नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि शहीद द्वार का शीघ्र पुनर्निर्माण कराया जाए ताकि शहीदों की स्मृति और शहर की ऐतिहासिक पहचान कायम रह सके। लोगों का कहना है कि जिस प्रकार पहले भी कुछ ऐतिहासिक संरचनाओं को हटाने के बाद नए निर्माण के आश्वासन दिए गए थे,उसी तरह इस बार भी केवल घोषणा न होकर वास्तविक निर्माण कार्य शुरू होना चाहिए।
इसके साथ ही नागरिकों ने यह मांग भी उठाई है कि दुर्घटना के लिए जिम्मेदार डंपर और उसके चालक की पहचान की जाए। क्षेत्र में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालकर दोषी वाहन चालक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए तथा उससे हुए नुकसान की भरपाई भी सुनिश्चित की जाए।
नई बस्ती के लोगों का मानना है कि शहीदों की स्मृति से जुड़ी इस ऐतिहासिक धरोहर का पुनर्निर्माण केवल एक निर्माण कार्य नहीं,बल्कि उन वीर जवानों के सम्मान और शहर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है। अब सभी की निगाहें प्रशासन और नगर निगम पर टिकी हैं कि वे इस दिशा में कितनी गंभीरता से कदम उठाते हैं।
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